June 14, 2023

106. “आदिवासी विमर्श” – श्रीमती रश्मि विश्वकर्मा,

By Gina Journal

Page No.: 745-751

आदिवासी विमर्श

श्रीमती रश्मि विश्वकर्मा

शोधार्थी हिंदी एवं भाषा विज्ञान विभाग, रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर म.प्र.

 

हिंदी में दो तीन दशकों से अस्मिता वादी लेखन चर्चा का विषय बना हुआ है। आदि काल से ही आदिवासी समाज को एक पिछड़ा समाज मानकर उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता रहा है। परंतु वर्तमान शिक्षा के प्रचार-प्रसार, शोषणकारी नीतियों के विरुद्ध सामाजिक व साहित्यिक आंदोलन से आदिवासी समाज में भी जागृति आई हैं । आदिवासी लेखकों और गैर आदिवासी लेखकों द्वारा प्रचुर मात्रा में आदिवासियों के बारे में लिखा जा रहा है जिसने समाज को एक नई दृष्टि प्रदान की है।

आदिवासी का अर्थ होता है-‘आदि निवासी’ आदिम जातियों और जनजातियों के लिए आदिवासी शब्द का प्रयोग प्राचीन समय से ही किया जाता रहा है। आदिवासियों की अपनी परंपराएं, संस्कृति, रीति रिवाज, मूल्य और मान्यताएं होती हैं।

विमर्श का अर्थ एवं परिभाषा:

विमर्श एक प्रकार का आलोचनात्मक कार्य है, जिसमें विवेक जन्य पहचान और प्रगतिगामी दृष्टि दोनों विद्यमान है। विमर्श अंग्रेजी के ‘डिसकोर्स’ का समानार्थक शब्द है।

आधुनिक हिंदी शब्दकोश के अनुसार –

“विमर्श का अर्थ सोच विचार कर तथ्य वास्तविकता का पता लगाना, किसी विषय पर कुछ सोचना, समझना, विचार करना, गुण दोषों आदि की आलोचना या मीमांसा करना, विचार, विनिमय, सोच विचार, परीक्षण, तर्कना, जांचना और परखना किसी से परामर्श या सलाह लेना है।”

विनायक तुकाराम के अनुसारः

“वर्तमान स्थिति में ‘आदिवासी’ शब्द का प्रयोग विशिष्ट पर्यावरण में रहने वाले, विशिष्ट भाषा बोलने वाले, विशिष्ट जीवन पद्धति तथा परंपराओं से सजे और सदियों से जंगल, पहाड़ों में जीवन यापन करते हुए अपने धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों को संभाल कर रखने वाले मानव समूह का परिचय करा देने के लिए किया जाता है और बहुत बड़े पैमाने पर उनके सामाजिक दुख तथा नष्ट हुए संसार पर दुख प्रकट किया जाता है। उनके प्रश्नों तथा समस्याओं पर भी जी तोड़कर बोला जाता है।”

अस्मिता मूलक विमर्श और आदिवा सीः

आदिवासी अस्मिता का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष है उनके जल, जंगल और जमीन यह उनके जीवन का वह अंश है जिसके अभाव में आदिवासी जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। समय-समय पर जब आदिवासियों को उनके जल, जंगल और जमीन से बेदखल किया जाता है तो वे आंदोलन करते हैं और इस प्रकार के आंदोलन का स्वरुप राष्ट्रीय होता है। आदिवासियों के सम्मान की रक्षा के लिए जो साहित्य लिखा गया वह आदिवासी अस्मिता का साहित्य है।

आदिवासी विमर्श स्वरूप और अवधारणाः

विमर्श केंद्रित लेखन की शुरुआत प्रायः 1950 के बाद ही नजर आती है। आदिवासी विमर्श आदिवासी अस्मिता की पहचान उसके अस्तित्व संबंधी संकटों और उसके खिलाफ जारी प्रतिरोध का साहित्य है। यह जल, जंगल, जमीन की रक्षा के लिए आदिवासियों के आत्मनिर्णय के अधिकार की मांग करता है। बाजार और सत्ता के गठजोड़ ने आदिवासियों के समक्ष अस्तित्व एवं अस्मिता का संकट खड़ा कर दिया है। जब सवाल अस्मिता और अस्तित्व का हो तो उसका प्रतिरोध होना भी स्वाभाविक है। सामाजिक एवं राजनीतिक प्रतिरोध के अलावा कला एवं साहित्य के माध्यम से भी प्रतिरोध किया गया। उसी के परिणाम स्वरूप आदिवासी साहित्य विमर्श केंद्र में आया।

रमणिका गुप्ता कहती है-“आदीवासियों को गैर आदिवासियों ने जंगली, काहिल, जाहिल, मूर्ख, सीधा साधा, भोला भाला या बुद्धू कहकर एक हीन भावना भर दी कि वे पिछड़े हैं और किसी काबिल भी नहीं है। धीरे.धीरे उनमें हीन ग्रंथि विकसित होती गई। आदिवासी साहित्य उन्हें इस ग्रंथि से मुक्त कराने का हथियार है।“

आदिवासी विमर्श की परंपरा को निम्न भागों में विभाजित कर स्पष्ट किया जा सकता है-

  1. पुरखा साहित्यः

आदिवासी समाज में हजारों साल पुरानी साहित्य की मौखिक परंपरा को रखा जा सकता है। जिसे पुरखौती कहा जाता है| 1950 के आसपास से आदिवासी कलम ने अपने को स्वरों में ढालना प्रारंभ किया।

आजादी के बाद जयपाल सिंह मुंडा’ के नेतृत्व में भारतीय राजनीति से साहित्य में आदिवासी चेतना की गूंज सुनाई देने लगी।

  1. आदिवासी भाषा में रचित साहित्य की परंपरा:

‘वंदना टेटे’ ने आदिवासी साहित्य संबंधी अपने चिंतन को अपनी पुस्तक “आदिवासी साहित्य: परंपरा और प्रयोजन” में रखा है।

आदिवासी साहित्य मुख्यतः सृजनात्मकता का साहित्य है। आदिवासी भाषाओं में लेखन और मुद्रण की परंपरा भी लगभग 100 साल से अधिक पुरानी है। इस परंपरा की और पड़ताल किए जाने की जरूरत है। मौजूदा स्रोत सामग्री के अनुसार मे मेननस ओड़ेय’ का ‘मतुराअ कहनि’ नामक मुंडारी उपन्यास पहला आदिवासी उपन्यास है। यह बीसवीं सदी के दूसरे दशक में लिखा गया। इसके 1 भाग का अनुवाद हिंदी में चलो चाय बागान’ शीर्षक से किया गया।

  1. समकालीन हिंदी उपन्यासों में आदिवासी जीवन का स्वरूप और विश्लेषण:

पुरवा साहित्य और आदिवासी भाषाओं से प्रेरणा लेकर हिंदी, बंगला, तमिल, मलयालम, उड़िया आदि भाषाओ में भी आदिवासी लेखन शुरू हुआ।

हिंदी में आदिवासी लेखन की शुरुआत तीन दशक पहले से मानी जाती है। हिंदी आदिवासी लेखकों में – हरिराम मीणा, महादेव टोप्पो, निर्मला पतुल, वंदना टेटे, ज्योति लाकड़ा आदि प्रमुख रचनाकार हैं।

हरिराम मीणा का उपन्‍यास ‘धूणी तपे तीर’ बीसवीं सदीं के प्रारंभ में डूंगरपुर बांसवाडा एवं उदयपुर के भील आदिवासियों के विद्रोह की कथा को केन्‍द्र में रखकर लिखा गया हैा इस उपन्‍यास में देसी रियासतों के राजा और ब्रिटिश सरकार दोनों मिलकर आदिवासियों का शोषण करते हैं। ब्रिटिशो द्वारा आदिवासियों पर हमला कर उन्हें गाजर मूली की तरह काट देने का भयावह नरसंहार का चित्रण इस उपन्‍यास में किया गया है। इस भयानक नरसंहार के संदर्भ में कथाकार ‘राजेंद्र मोहन’ लिखते हैं-

“मानगढ़कांड अनायास ही जलियांवाला बाग की याद ताजा कर देता है। तब भी अंग्रेजों ने निहत्‍थी भीड पर अंधाधुंध गोलियों की वर्षा की थी। पंद्रह से बीस हजार तक लोग वहां इकठठा थे। इनमें से 379 लोग मारे गए थे।”

‘रणेंद्र के उपन्‍यास ‘गायब होता देश’ में आदिवासियों के विस्‍थापन को केंद्र बिंदु बनाया गया है। बांध परियोजना, विशेष आर्थिक क्षेत्र, रियल स्‍टेट म्‍यूजियम आदि के विकास के कारण आदिवासियों का देश उनसे छूट ही नहीं रहा है, बल्कि नक्शे से ही गायब होता जा रहा है।”

‘रणेंद्र’ का उपन्यास ग्लोबल गांव का देवता’ झारखंड राज्य के अवैध खनन के द्वारा बॉक्साइट के निकाले जाने एवं ग्रीन हंट जैसी योजनाओं का पर्दाफाश करता है। आज ग्लोबल विलेज’ बनने अंतरराष्ट्रीय कंपनियां आदिवासी क्षेत्रों को नष्ट कर रहे हैं। जिससे आदिवासी विस्‍थापन की समस्‍या खडी हो रही है। इसी का चित्रण इस उपन्यास में किया गया है।

‘तेजिंदर’ का उपन्यास ‘काला पादरी’ में मध्यप्रदेश के सरगुजा जिले में रहने वाले आदिवासियों की सामाजिक, आर्थिक समस्याओं को उपन्यास का केन्‍द्र बनाया गया है। आदिवासियों में प्रचलित अंधविश्वास, जादू टोना, भूत प्रेत आदि को मानने वाली कुप्रथाओं का भी उल्लेख इस उपन्यास में किया गया है।

‘शानी’ के उपन्यास ‘सांप और सीढ़ी’ का पात्र दयाशंकर’ भोली भाली आदिवासी जनता का धर्म परिवर्तन कर उन्हें ईसाई बनाता है। ‘शानी’ लिखते हैं-“पास्टर के सहयोग से कैयो ने नौकरियां कर ली, मास्टरनियां हुई और आराम इज्जत की जिंदगी गुजार रही हैं, बिलई जो जबलपुर की किसी ट्रेनिंग में है और अगर आज डोली कहीं पास्टर के पास होती तो आदमी बन गई होती।”

समकालीन हिंदी उपन्यासों में आदिवासी स्त्रियों का चित्रणः

समकालीन हिंदी उपन्यासों में स्त्रियों की चर्चा करें तो ‘संजीव’ के उपन्यास ‘धार’ एवं ‘जंगल जहां से शुरू होता है’। विनोद कुमार’ का उपन्यास समर शेष है, राजेंद्र अवस्थी’ का उपन्यास ‘जंगल के फूल’ तथा मैत्री पुष्पा’ का उपन्यास ‘अल्मा कबूतरी’ आदि उपन्यासों में स्त्री शोषण का चित्रण किया गया है।

संजीव’ के उपन्यास जंगल जहां से शुरू होता है’ मे ‘मालती’ नामक स्त्री पात्र का स्त्रीत्व एक दरोगा द्वारा जो जांच पड़ताल करने आता है के द्वारा तार तार किया जाता है।

‘संजीव’ के उपन्यास ‘धार’ में स्त्री पात्र ‘मैना’ के शोषण का चित्रण किया गया है।

मैत्रीय पुष्पा’ के उपन्यास ‘अल्मा कबूतरी’ में अल्मा के शोषण की कथा का चित्रण मिलता  है।

सारांश:

देश के मूल निवासी होने के नाते औपनिवेशिक युग के पूर्व आदिवासियों की अपनी स्वतंत्रता थी। जल, जंगल, जमीन और प्रकृति के संसाधनों पर उनका अधिकार था। लेकिन जब साम्राज्यवादी ताकतें और औपनिवेशिक सत्ताएं मजबूत होती गई। तब से आदिवासियों का शोषण और अत्याचार बढ़ने लगा। आदिवासी अपनी एक विशिष्ट भाषा, संस्कृति. सामाजिक व आर्थिक व्यवस्था, परंपरा, प्रथा, स्वतंत्रता, परिश्रमता और साहसिकता को लेकर जीवन जीने वाले विशिष्ट समूह है। लेकिन आज भी लोग मानते हैं कि आदिवासी जातियां जंगली हैं, असभ्य हैं, अशिक्षित हैं। परंतु प्राकृतिक औषधि गुण, विज्ञान शास्त्र, सृजन कला आदि की जो क्षमता उनमें है वह किसी अन्य संस्कृति सुशिक्षित जातियों में देखने नहीं मिलती। आज विकास के नाम पर हो रहे व्यवहार से उनकी पूरी संस्कृति, समाज, मूल्य, परंपराएं, रूढ़ियां, साहित्य और भाषा खतरे में है। ‘आदिवासी विमर्श’ इसी का परिणाम है इसमें इनकी सभी समस्याओं को उजागर किया गया है।

 

संदर्भ ग्रंथ:

  1. गोविंद चातक, आधुनिक शब्दकोश, पृ.सं. 529
  2. उमाशंकर चौधरी, सं. : हाशिए की वैचारिकीः विनायक तुकाराम: आदिवासी कौन, 2008, अनामिका पब्लिशर नई दिल्ली, पृ.सं. 25
  3. रमणिका गुप्ता, युद्धत आम आदमी, जुलाई- सितंबर 2007 पृ.सं. 49
  4. हरिराम मीणा, धूणी तपे तीर, साहित्य उपक्रम, राजस्थान तृतीय संस्करण 2014 पृ.सं. 33
  5. रणेंद्रगायब होता देश, पेगिड़न बुक्स इंडिया, प्रथम संस्करण 2014 पृ.सं. 120
  6. रणेंद्र ग्लोबल गांव का देवता, प्रकाशन भारतीय ज्ञानपीठ, दूसरा संस्करण, 2014 पृ.सं. 92-93
  7. तैजिंदर गगन, काला पादरी, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्‍ली, 2004 पृ.सं. 44
  8. शानी, सांप और सीढ़ियां, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्‍ली, 1981 पृ.सं. 140
  9. संजीव, जंगल जहां से शुरू होता है. राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्‍ली, 2000 पृ.सं. 181
  10. संजीव, धार, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्‍ली, 1990, पृ.सं. 114

 

शोधार्थी,

श्रीमति रश्मि विश्वकर्मा,

रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर

मध्य प्रदेश,