May 9, 2023

32. दंड-विधान: जातिगत स्त्री शोषण का जीवंत दस्तावेज- मनीषा देवी   

By Gina Journal

Page No.: 217-222

दंडविधान: जातिगत स्त्री शोषण का जीवंत दस्तावेज 

मनीषा देवी

            स्त्री-पुरुष दोनों हमारे समाज के महत्वपूर्ण अंग हैं लेकिन भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में स्त्रियों को दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता है। पितृसत्तात्मक समाज में पुरुषों ने स्त्रियों को केवल एक वस्तु माना है। स्त्री विमर्श का सरोकार जीवन और साहित्य में स्त्री मुक्ति के प्रयासों से है। स्त्री की स्थिति की पड़ताल उसके संघर्ष एवं पीड़ा की अभिव्यक्ति के साथ-साथ बदलते सामाजिक संदर्भों में उसकी भूमिका , खोजे गए रास्तों के कारण उपजे नये प्रश्नों से जूझने के साथ-साथ आज भी स्त्री मुक्ति का मुख्य प्रश्न उसको मनुष्य के रूप मे स्वीकार न करने का ही है। इस संदर्भ में रेखा कस्तवार लिखती हैं कि-“स्त्री होना और मनुष्य होना परस्पर अपवर्जक है।”[1] अतः स्त्री विमर्श का मुख्य उद्देश्य स्त्रियों को भी पुरुषों के समान मनुष्य समझने की है। भारतीय समाज जो वर्ण व्यवस्था के रूप में विभाजित है। जिसमें स्त्रियों एवं दलितों को शूद्र माना जाता है। वर्तमान समय में वर्ण-व्यवस्था जाति-व्यवस्था में तब्दील हो गई है। जिसे सवर्ण, पिछड़ी एवं दलित जातियों में विभाजित किया गया है। विभाजन के इस क्रम में दलित सबसे निचले पायदान पर आता है और दलित स्त्रियाँ उससे भी नीचे समझी जाती हैं। स्त्रियों का स्थान प्रत्येक जाति में पुरुषों से नीचे है। हमारे भारतीय समाज में जाति से व्यक्ति का सम्मान निर्धारित किया जाता है न कि उसके प्रोफेशन या कार्य से। दलित एवं स्त्री की योग्यता पर हमेशा संदेह किया जाता है। सवर्ण एवं दलित स्त्रियों की सामाजिक स्थिति में काफी अंतर दिखाई देता है। सवर्ण समाज में स्त्रियों को अपनी पहचान बनाने के लिए धन, शिक्षा, ऊँचे संबंध और जानकारियाँ सवर्ण पुरुषों की तुलना में काम प्राप्त होती हैं। लेकिन दलित एवं पिछड़े समाज में पुरुषों के पास अपनी पहचान बनाने के अवसर सवर्ण पुरुषों की तुलना में बहुत काम प्राप्त होते हैं और दलित-पिछड़े समाज की स्त्रियों के पास पहचान का अवसर लगभग शून्य होता है।सवर्ण स्त्रियाँ भी अपने परिवार एवं समाज में दोयम दर्जे पर हैं लेकिन उनकी सामाजिक स्थिति दलित पुरुषों के लगभग बराबर हैं। मुद्राराक्षस के अनुसार सवर्ण और दलित स्त्रियों के बीच एक ऐतिहासिक अंतर यह होता है कि- “सवर्ण स्त्री शूद्रों वाले काम तो नहीं ही करती, दूसरे मजदूरी भी दलित-पिछड़ी स्त्रियों की तुलना में बहुत कम करती हैं। दलित-पिछड़ी स्त्रियों में स्थिति इससे उलटी होती ·है। वे पाखाना साफ करने से लेकर करघे पर तो काम करती ही हैं, मजदूरी भी बड़े पैमाने पर करती हैं। पर वे जो मजदूरियाँ करती हैं, उनसे वे नगण्य मात्रा में भी हैसियत नहीं बना सकतीं। सवर्ण स्त्री दफ्तर में काम न करें, घर में किसी दलित स्त्री से काम करवा लें, तो भी उसकी हैसियत अपने सवर्ण पति के कारण बन जाना मुश्किल नहीं होता।”[2]

समकालीन उपन्यासकारों में मुद्राराक्षस का महत्वपूर्ण स्थान है।दलित समाज और संगठन के लोग मुद्राराक्षस को अपना अघोषित प्रवक्ता मानते थे। वे अकेले ऐसे लेखक थे, जिनके सामाजिक सरोकारों के लिए उन्हें जन संगठनों द्वारा सिक्कों से तौलकर सम्मानित किया गया। उन्हें विश्व शूद्र महासभा द्वारा ‘शूद्राचार्य’ और अंबेडकर महासभा द्वारा ‘दलित रत्न’ की उपाधियाँ प्रदान की गईं। मुद्राराक्षस की प्रारम्भिक रचनाएं 1951 ई. में प्रकाशित होना प्रारंभ हुईं। दो साल में ही वे चर्चित लेखक बन गए थे। कहानी, कविता, उपन्यास, नाटक, आलोचना, इतिहास, संस्कृति और समाजशास्त्र जैसी अनेक विधाओं में उन्होंने लेखन कार्य किया। सभी विधाओं में उनकी 65 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। मुद्राराक्षस ने अपनी असाधारण प्रतिभा एवं सृजनशीलता से समाज, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में हजारों वर्षों से जमे-जमाए सामाजिक विद्रूपताओं पर जमकर प्रहार किया है। वे जीवन पर्यंत समाज के हाशिये पर धकेल दिए गए लोगों की आवाज बने रहे। वे अपने धारदार लेखन से सामाजिक सरोकारों को हाशिये से केंद्र में लाने में सफल रहे। सड़क पर लड़ी जा रही जनपक्षीय लड़ाई में वे हमेशा अग्रिम पंक्ति में खड़े रहे तथा समसामयिक राजनीति पर निर्भीक टिप्पणी करने से भी नहीं चूकते थे। साठ के दशक के बाद साहित्य में विमर्शों का उदय होता है। मुद्राराक्षस ने अपनी रचनाओं में समाज के वंचित वर्गों के उत्पीड़न, संघर्ष एवं प्रतिरोध को समाज के समक्ष प्रस्तुत किया है। उन्होंने दलित, स्त्री, राजनीति में बढ़ते पूंजीवाद एवं भ्रष्टाचार, एवं धार्मिक अंधविश्वासों को केंद्र बनाकर उपन्यासों का लेखन किया है। मुद्राराक्षस मूलतः मार्क्सवादी विचारधार के समर्थक थे लेकिन भारतीय संदर्भ में समाज को समझने के लिए वे वर्ग भेद के स्थान पर जाति भेद को महत्वपूर्ण मानते हैं। जाति हमारे देश की एक कड़वी सच्चाई है। वर्तमान समय में हम आधुनिकता का दिखावा करते हुए भले ही जाति व्यवस्था को नकारते हों लेकिन मानसिक रूप से जातिवादी ही हैं। हमारे समाज की संरचना ही ऐसी है कि जातिवाद का जहर जाने-अनजाने हमारे भीतर परवेश कर ही जाता है। इस उपन्यास में जातिगत स्त्री शोषण को यथार्थ रूप में चित्रित किया गया है। मुद्राराक्षस स्त्रीवादी लेखक या चिंतक नहीं हैं किन्तु वे स्त्री-पुरुष की समानता के पक्षधर हैं। वे स्त्रियों के साथ इसलिए खड़े होते हैं क्योंकि वे सदियों से पितृसत्तात्मक समाज द्वारा शोषण का शिकार होती रही हैं। ‘दंड-विधान’ उपन्यास 1986 ई. में प्रकाशित हुआ था। हिन्दी साहित्य में जब दलित साहित्य बहुत प्रबल रूप में व्याप्त नहीं था लेकिन मुद्राराक्षस ने उसी समय दलित स्त्रियों के साथ सवर्ण पुरुषों द्वारा किए जाने वाले बलात्कार जैसे घिनौने कृत्य के माध्यम से उनके शोषण को अभिव्यक्त किया है। इस उपन्यास में मुद्राराक्षस ने जमींदारों एवं सामंतों द्वारा निम्न वर्ग की स्त्रियों के किए जाने वाले शोषण को दिखाया है। जमींदार लोग निम्न जाति की औरतों को अपने खेतों में रात में काम करने के लिए बुलाते थे। उनमें से जो स्त्री उन्हें अच्छी लगती थी वे उसका शारीरिक शोषण करके मजदूरी में उसे फसल का एक गट्ठा अन्य औरतों से अधिक दे देता था। ऐसा एक दिन भीखम की बीबी के साथ हुआ। वह घर पर आकर रो रही थी। भीखम ने गुस्से में माचिस से पुआल में आग लगा दिया और आग ज्यादा फैल गई और वे दोनों उसी आग में जलकर मर गए लेकिन जमीदारों के शोषण का प्रतिरोध करने की क्षमता उनमें नहीं थी। इस घटना के बाद मास्टर भूरेलाल के साथ गाँव के लोगों ने निर्णय लिया कि वे रात में अपने घर की औरतों को काम करने के लिए नहीं भेजेंगे। इससे भी उनकी स्थितियों में ज्यादा बदलाव नहीं हुआ और वे दिन में भी उनकी स्त्रियों का शोषण करने लगे। एक बार छेदी की बीबी, भगत की बेटी और बहन जंगल से लकड़ियाँ और महुआ लेकर आ रही थी तो शाम के समय लच्छू और जयपाल ने उन्हें घेर लिया। भगत की बेटी और बहन किसी तरह भाग निकली और छेदी की बीबी लकड़ियों के गट्ठर के कारण भाग न सकी तो उन लोगों ने उसका बलात्कार किया। इस घटना के बाद भद्रा के लोग साहस करके इसकी रिपोर्ट लिखवाने थाने गए लेकिन वहाँ भी उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई बल्कि पुलिस उनसे ही उलटे-सीधे प्रश्न पूछने लगी। वे लोग निराश होकर वापस आ गए। पुलिस के कुछ सिपाही लच्छू के घर गए और रिश्वत लेकर आ गए। रात मे जयपाल और लच्छू लाठी, बंदूक लेकर उन लोगों के घर पहुँच गए और नरीराम को पीट-पीटकर मार दिया। बिशन जो नौरतन सिंह का भाई था, वह गरीब लोगों का साथ देता था। नरीराम की पत्नी ने मास्टर भूरेलाल से हत्यारों को जेल भिजवाने की बात कही तो भूरेलाल ने जवाब में जो कहा उसमें हमारे प्रशासन का यथार्थ परिलक्षित होता है-“जेल किसको भिजवाओगे तुम लोग? अरे जेल भी लच्छू और जयपाल की है और अदालत और थाना भी उन्हीं का है। समझे? तुम्हारे लिए नहीं है, समझ लो। और अगर जेल और कानून की सोच रहे हो तो मरते रहो सब इसी तरह। मार खाते रहो और मरते रहो। कानून किसने बनाया है..तूने? अदालत में कौन बैठता है..तू? सालों! जो कानून बनाते हैं और अदालतें चलाते हैं, वो वही हैं जो मौका पाकर तुम्हारी बेटी उठा ले जाते हैं। समझे?”[3] अब आगे वे लोग इस विषय को अदालत में ले जाना चाहते थे। इसकी सूचना जब जयपाल, लच्छू और उसके आदमियों को मिलती है तो जोगेश्वर के यहाँ चल रही बैठक में जयपाल जो बातें कहता है उसमें समाज का जातिगत विद्वेष स्पष्ट दिखाई देता है-“इनकी इतनी हिम्मत हो गई है कि हम लोगों को अदालत में घसीटेंगे? अब नीच जात अदालत में सिर उठाकर खड़े होंगे और हमको मुल्जिम बनायेंगे।”[4] इसी तरह अन्नू की बीबी का लच्छू, जयपाल आदि लोग बलात्कार करते हैं तो बेदाना की आजी उसके ही चरित्र पर उँगली उठा देती है। वह कहती है कि वह खुद ही गई थी। अपनी दादी की बात सुनकर बेदाना आश्चर्यचकित हो जाता है और अपने मन में सोचता है-“भीखम की बीबी क्या खुद गई थी? संजू की बेटियाँ क्या खुद गयी थीं? छेदी की बीबी क्या खुद गयी थी? यह संभव नहीं है। अन्नू की बीबी के साथ भी वही हुआ है, जो औरों के साथ हुआ।”[5] हमारे समाज में व्याप्त अंधविश्वास का शिकार किस प्रकार महिलाएं होती हैं। इसका भी यथार्थ चित्रण इस उपन्यास में हुआ है। तंत्र क्रिया के नाम पर ढोंगी बाबा कैसे लोगों को मूर्ख बनाते हैं और लोग उनसे तर्क भी नहीं करते हैं। उन बाबाओं के द्वारा कही बातों को लोग देववाणी की तरह सत्य मान लेते हैं फिर वे अंधश्रद्धा के नाम पर किसी की हत्या करने से भी नहीं घबराते हैं। बलात्कार की वजह से अन्नू की बीबी के पेट में दर्द हो रहा था लेकिन पंडित रामचरण ने कुमुद के तांत्रिक अनुष्ठान के समय कहा था कि बच्चा न होने के लिए जिसने इसके ऊपर तंत्रक्रिया कराई होगी, उसके पेट में दर्द होगा। अन्नू की बीबी के पेट में दर्द की खबर सुनते ही लोग पीट-पीटकर उसकी हत्या कर देते हैं। बेदाना नामक मुसहर जो उससे प्रेम करता था लेकिन अपनी भावनाएं कभी व्यक्त नहीं कर सका था। उसकी मृत्यु पर वह गरीब एवं शोषित लोगों की पीड़ा को इन शब्दों में व्यक्त करता है-“देख ले तू। ये हैं तेरे लोग। उन लोगों ने पत्थरों से मार-मार कर तुझे मार डाला और ये लोग ऐसे देख रहे हैं जैसे गूंगे हों, बहरे हों, अपाहिज हों। देख ले तू।”[6] वह उसे न्याय दिलाने के लिए उसकी लाश अदालत में ले जाने के बारे में सोचता है। वह उसकी लाश बैलगाड़ी पर लेकर शहर जाता है। रास्ते में एक नाके पर उसे जीप में जनेश्वर और महेश्वर मिल जाते हैं। वे कुमुद को अस्पताल ले जा रहे थे। बेदाना उसकी लाश जीप में रख देता है और पुलिस वालों से उन्हें गिरफ्तार करने को कहता है। पुलिस उन लोगों को लेकर थाने जाती है, बाद में जनेश्वर को छोड़ देती है और बेदाना को आंचलगंज थाने जाने को कहती है। इस तरह अन्नू की बीबी को भी न्याय नहीं मिलता है। गाँव वापस आकर बेदाना जोगेश्वर सिंह को अकेले जाते देखता है तो वह उन पर हमला कर देता है और पत्थरों तथा ढेलों से मारकर उनकी हत्या कर देता है क्योंकि अन्नू की बीबी की हत्या और बलात्कार का बदला वह इन लोगों से लेना चाहता था।

संदर्भ ग्रंथ सूची –

1-कस्तवार, रेखा. (2013). स्त्री चिंतन की चुनौतियाँ. नई दिल्ली:राजकमल प्रकाशन. पृ. सं. 24

2- मुद्राराक्षस. (2016). स्त्री, दलित और जातीय दंश. नई दिल्ली: गौतम बुक सेंटर. पृ. सं. 24

3- मुद्राराक्षस. (1986). दंड-विधान. नई दिल्ली: राधाकृष्ण प्रकाशन. पृ. सं. 53

4- वही. पृ. सं. 54

5- वही. पृ. सं. 92

6- वही. पृ. सं. 127

 

मनीषा देवी                                                                                                                                                                 

शोधार्थी (पी-एच. डी. हिन्दी)

अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद