May 20, 2023

70. कृष्णा अग्निहोत्री की चयनित  कहानियों में वृद्ध जीवन – सविता गोपीनाथन

By Gina Journal

कृष्णा अग्निहोत्री की चयनित  कहानियों में वृद्ध जीवन

सविता गोपीनाथन

वृद्धावस्था धीरे धीरे आनेवाली अवस्था है जो कि स्वाभाविक और प्राकृतिक घटना है। वृद्ध का शाब्दिक अर्थ है पका हुआ या परिपक्व। वृद्ध विमर्श का अर्थ है वृद्धावस्था की परिस्थितियों,घटनाओं आदि का चिंतन करना अर्थात वृद्धावस्था की समस्याओं को समझ कर उनके लिए उचित स माधान निकालना। जीवन भर मरते -खपते रहो, जोड – तोड़ करते रहो और अंतिम दिनों में इंद्रिय निष्क्रिय हो जाने पर उपेक्षित और तिरस्कृत सा जीवन बिताओ। यह एक तरह का अभिशाप है,जो मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी भी।

समाज में हम वृद्ध लोगों के रहन सहन और उनका जीवन किसप्रकार जीते है यह सब देखते है। पाश्चत्य संस्कृति की ओर आकर्षित होकर युवा पीढ़ी अपने माता-पिता को बोझ समझ रहे है। परिवार के सदस्यों को एक धागे में बांधने की क्षमता वृद्धों में थी, जिस कारण वह जमाना संयुक्त परिवार का था। लेकिन धीरे-धीरे संयुक्त परिवार प्रथा समाप्ति की ओर बढ़ रही है। एकल परिवार एवं छोटे परिवार की अवधारणा और जीवन की समस्याओं और व्यस्तताओं के बीच रोजगार की तलाश में युवाओं के घर से दूर चले जाने के कारण वृद्ध अपने आपको अकेला, असहाय और असुरक्षित महसूस कर रहे है। वृद्धों की समस्या के पारिवारिक , सामाजिक ,मनोवैज्ञानिक ,शारीरिक , आर्थिक, राजनैतिक और मूल्याधारित अनेक आयाम है। दैहिक शक्ति क्षीण होने के कारणमात्र से उनकी पारिवारिक और सामाजिक हैसियत का कम हो जाना आज के युग की सांस्कृतिक मूल्य ह्रासता का द्योतक माना जा सकता है।

भारतीय समाज में वृद्धों को अत्यंत उच्च एवं आदर्श स्थान देते थे। श्रवण कुमार ने अपने वृद्ध मां बाप को कंधे पर लेकर संपूर्ण तीर्थयात्रा करवाई थी। लेकिन पाश्चात्य सभ्यता के पीछे होनेवाले भाग – दौड़ ने युवाओं को वृद्धों की देखभाल से बहुत दूर कर दिए है। कितनी विडंबना है कि पूरे परिवार पर बरगद की तरह छाव फैलानेवाला व्यक्ति वृद्धावस्था में अकेला,असहाय एवं बहिष्कृत जीवन जीता है।जीवन भर अपने मन ,कर्म व वचन से रक्षा करनेवाला ,पौधे से पेड़ बनानेवाला व्यक्ति घर में एक कोने में उपेक्षित पड़ा रहता है या अस्पताल में या वृद्धाश्रम में अपनी मौत की प्रतीक्षा करता है ।आधुनिक उपभोग संस्कृति एवं सामाजिक मूल्यों के नष्ट होने की यह परिणति है।

वृद्ध व्यक्ति अनुभव का धनी होता है।वह अपने ज्ञान और अनुभव के द्वारा नयी पीढ़ी को आगे के राह दिखाने में सक्षम है। किंतु नई पीढ़ी किसी भी मामले में पुरानी पीढ़ी का हस्तक्षेप पसंद नहीं करते।

हिंदी कहानी लेखकों ने अपनी रचनाओं में वृद्ध जीवन की विसंगति को विशेष महत्व देकर ही प्रस्तुत किया है।

श्रीमति कृष्णा अग्निहोत्री हिंदी के जाने माने लेखिकाओं में अपना अस्तित्व प्रतिष्ठित करने में सफल निकली है। आपकी कहानी संग्रह ‘ अपना अपना अस्तित्व ‘ वृद्ध जीवन की विभिन्न पहलुओं को अंकित करती हैं।

कृष्णा जी की कहानी ‘ अपना अपना अस्तित्व ’ में दो वृद्ध महिलाओं के माध्यम से सांध्य बेला की त्रासदी का अंकन किया है । दोनों महिलाएं ( दिव्या व निर्मला )विधवा है लेकिन आर्थिक रूप से संपन्न। दिव्या का अपना कोई संतान न था, पति गांव से लाए पांच वर्षीय सदन को बेटा मानकर पालन पोषण किया व हेमा नामक लड़की से उनका विवाह करा दिया। दिव्या एक ऐसी महिला थी जो रिश्तेदारों को आर्थिक सहायता करने में कभी पीछे न हठी। अपनी वसीयत में सदन के नाम चार लाख लिखने को भी वे नही भूली। वे सदन, हेमा और बच्ची के साथ खुशी से जीवन बिता रहे थे कि अचानक एक दिन सदन परिवार सहित दूसरे फ्लैट लेकर चले गए। यह अकेलेपन दिव्या से सहा नहीं सका। वह जल्द ही हार्ट पेशेंट बने और अकेलेपन से मुक्ति के लिए भाई चंद्रशेखर के तीसरे मंजिल के घर में शिफ्ट हो गए । देवर के मुंडन के लिए पचास सीढीवाले मंदिर में चढ़ कर उतरी तो वहीं दम तोड़ दिया। “क्या मिला दिव्या को ? उसने परायों को अपनत्व दिया और स्वयं अकेलेपन को सहती मौत के आगोश में चली गई।  इससे हेमा का कुछ न बिगड़ा न सदन का भी ” दिव्या की आत्मसम्मान और स्वाभिमान को चोट पहुंची थी। कहानी का दूसरा वृद्ध पात्र है निर्मला जो कवयित्री है। इकलौते बेटे मुन्ना बहू मिनी और बच्चों के साथ अपने पति के बनाए घर में रहती हैं । घर के सभी कामों में वे हाथ देती है फिर भी  उनका बाहर कुछ देर बिताना और मित्रों से मिलना  बहू को असहनीय कर देती है। मुन्ना मां को स्नेह देना भूलकर पत्नी के साथ अपने अस्तित्व कायम रखते है। नई पीढ़ी वृद्ध मां बाप को घर में केयर टेकर की भूमिका निभाने को प्रेरित करते है। वे उन वृद्धों की भावनाओं को कोई महत्व नहीं देता । “ हमारे साथ रहना है तो यह सब करना ही चाहिए वरना अन्यत्र रहो।” यहां निर्मला को उनके पति द्वारा बनाये घर से बाहर जाने को पुत्र कहते है। घर तो निर्मला के नाम पर है ही । बेटे- बहू को मां की जरूरी घर संभालने और बच्चों के पालन के लिए होती है उसी तरह मां के बैंक अकाउंट पर उनकी नज़र जरूर है।

वृद्ध जीवन का अंकन करनेवाली कृष्णा जी की अन्य कहानी है ‘ मैं जिंदा हूं ’ । यहां वृद्धों की प्रतिनिधि रागिणी है। जो सेठ बिंदा परिवार की इकलौती संतान एवं अंग्रेजी साहित्य का ग्रैजुएट व डिप्टी कलेक्टर मनीष की पत्नी है। वह मां की बात “ बेटी, शादी के पश्चात पति को संभालना,परिवार में रिश्तों का स्वीकारना हम स्त्रीयों का ही धर्म है और धर्म को आस्था से अपनाया जाता है , वहां तर्क कम नहीं आता। ”

को शिरोधार्य करने से पति को नहीं समझा पाई कि चार बच्चों से अधिक का बोझ वह नहीं उठा पाएगी। छठे बच्चे की में बनी तो उन्हे सन्निपात हो गया। बीमार रागिनी से छः बच्चे और पति का संभालना कठिन था फिर भी वह ऐसे ही वैसे सब कुछ संभाला। बड़े दो लड़के वक्कील और इंजीनियर बन के दूर-दूर पोस्ट हो गए। बेटियां न्यूयॉर्क में बसी है। मझले बेटे और बहू के साथ अपने ही घर में वृद्ध मनीष और रागिनी रहते है।बेटे और बहू अपने अपने कामों में व्यस्त। बहू ऊपर की कमरे से नीचे की ओर उतरते ही नहीं। हार्ट अटैक से मनीष का निधन हुआ तो रागिणी की स्थिति और भी बिगड़ गई। कुछ दिन के अंतर  रागिणी को उनके समान सहित छोटे से एक कमरे में शिफ्ट करा दिया।उनके साथ बहू का व्यवहार और भी तीखी हो गई। रागिणी का मन पोतों का आलिंगन करना चाहा लेकिन उन बच्चों के स्पर्श मात्र से वे वंचित रही। पति के पेंशन तीस हजार और अपने माता-पिता के पच्चास लाख के अधिकारी रागिणी को अपने ही घर में भिखारी सा जीवन बिताना पड़ा। हर पहली तारीख को बेटा चैक बुक साइन करवा के विशेष भोजन रागिनी को देते। रागिणी प्रेत्येक महीने की पहली तारीख के लिए व्याकुल रहती ताकि उस दिन उन्हें अच्छा भोजन मिले। वर्ष बिता कि बेटा आशीष और बहू मीना रागिणी को कार में बैंक ले गए और मैं जिंदा हूं का आवेदन पत्र जमा किया। उस दिन भी रागिणी को विशेष भोजन मिले, किंतु पैसे मिलने पर छीन लिए गए। रागिणी की छोटी बेटी जो मां को स्नेह करती है की राय में “वृद्ध होना कोई पाप नहीं किसी भी उम्र में व्यक्ति अपनी सहज जिंदगी जी सकता है। ”

वृद्ध जीवन संबंधी कृष्णा जी की अन्य कहानी है ‘ तोर जवानी सलामत रहे ’ । यहां वृद्ध जीवन की शिकार सावित्री है जो प्राइमरी स्कूल शिक्षक गोपाल की मां है। इस कहानी में सावित्री को पीड़ा देनेवाला एकमात्र पात्र लल्लन है जो गोपाल का इकलौता संतान है। गोपाल अपनी नौकरी के कम वेतन से पत्नी कला और बेटे के साथ जीवन बिता रहे थे। उनके पिता की मृत्यु होने पर कला सास को गांव से घर ले  आती है, जो लल्लन को खलता है।वह हमेशा दादी को दुत्कारता रहता। कला सावित्री का अच्छा देखभाल करती और उन्हें भी कला बहुत भाती है। अपने से जो कुछ भी हो सावित्री कला की सहायता करते। गोपाल की मृत्यु जब निमोनिया से होती है तो

लल्लन पिता के निधन का उत्तरदाई दादी को कहकर उन्हें कोसते रहते है और गांव जाने को कहते रहते है। गोपाल की मृत्यु के बाद आजीविका के लिए कला दूर के घरों में रसोई का काम करने को प्रेरित होती है। कला की अनुपस्थिति में लल्लन दादी को शारीरिक यातनाएं भी दी। मछली उनके मुंह पर उलटती है और रात को हाथों को पकड़ घर घींचते उन्हें सुनसान सड़क में छोड़ देती है सावित्री कहती है “ईश्वर तेरी जवानी सलामत रखें। ”

नई पीढ़ी यह नहीं सोचते कि बुढ़ापा एक न एक दिन उनके जीवन में भी आयेंगे और तब वह कैसे उससे गुजरेंगे।

वृद्ध जीवन पर आधारित कृष्णा जी की एक और कहानी है ‘ टीन के घेरे ‘ । मिडिल स्कूल अध्यापक पंडित राधेलाल मिश्र और पत्नी गंगा यहां वृद्ध जीवन की त्रासदी को झेल रहे है ,ज्यादातर गंगा। दोनों के चार बच्चे हैं – ओवरसीयर वीरेंद्र, हायर सेकेण्डरी के अंग्रेजी अध्यापक ज्ञानेश, रूपा एवं व्रजेश। वीरेंद्र सपरिवार दूर रहते है और बीच बीच घर आते है। वृद्ध गंगा खांसी से पीड़ित है फिर भी वह घर का सारा काम संभालती है। दुकान जाने की जिम्मेदारी वृद्ध पंडित जी पर है। बच्चे अपने कामों में व्यस्त दिखाई देते हैं। जब भी पंडित जी किसी भी कार्य पर बच्चों को डांटते तो तुरंत गंगा बच्चों के साथ देकर पंडित जी को नकारते। परिणाम यह निकला कि पंडित जी के जरा जी आवाज पर सब कमरे से निकलकर एक साथ चिल्लाने लगते “ ठीक से रहिए घर में ,अब आपकी तानाशाही नहीं चलेगी। जहां जाना हो चले जाइए। ” बच्चों के साथ देने से गंगा को कोई विशेष स्नेह बच्चों से भी नहीं मिला। गर्मी की छुट्टियों में वीरेंद्र घर आकर छोटे भाइयों से छत के ऊपर टीन के कमरे बनवाकर नीचेवाले कमरे किराए पर देने का प्रस्ताव रखते है ताकि परदेश में किराए देने को उन्हें घर से सहायता मिल सकें। छत पर टीन के कमरे बन जाने पर कोई वहां रहने को कोई तैयार नहीं होते । आखिर बेचारी वृद्ध गंगा को वहां रहना पड़ती है।  अब दोनों  बहुएं मिलकर रसोई संभालती हैं ओर गंगा को टीन के कमरे से बाहर उतरने भी न देती । टीन का कमरा अब गंगा के लिए घेरा बन चुकी है। नाममात्र भोजन नौकरानी बिहारी के हाथों से अब

गंगा को मिलती है।  वीरेंद्र के लड़के का जनेऊ आनेवाला है यह जानकर गंगा बहुत खुश होती है और लड़के को एक घड़ी देने को वह तय करती  है । वीरेंद् घर आकर गंगा को ले चलेंगे ऐसी  प्रतीक्षा में वह बैठती है लेकिन वह घरवालों को पत्र लिखकर ही निमंत्रण करते है। पत्र में मां के लिए कोई विशेष बात भी न थी।  जनेऊ का दिन सब लोग बीमार गंगा को घर छोड़कर चले जाते है। शाम को वापिस आए पंडित जी के हाथ में एक डले था जिसमें गंगा के लिए कुछ मीठाइयां और एक साड़ी थी। पड़त की से गंगा को ज्ञात हुआ कि जनेऊ में गंगा का जिक्र किसीने नहीं किया। गंगा मिठाइयां बिहारी हाथ देकर पड़ोस में बांटने को कहती है और यह भी बोलती है कि उन लोगों से कहना आज ही मां  जी जनेऊ से लौटी है। पुत्र द्वारा इतना अपमानित होने  के  बावजूद भी उनका मां हृदय दूसरों के सामने पुत्र की प्रतिष्ठा बनाया रखना चाहती है।

कृष्णा जी की ‘ प्रेमाश्रय ‘ कहानी की वृद्ध महिला है पुष्पा। जो कि अब सांध्यबेला को बिताने अपने गांव आए है।   पति शीतल के निधन के बाद पुत्रों के साथ बंबई एवं बैंगलोर का जीवन उसकी वृद्धावस्था में शांति न दी।

पंडित भगीरथ मिश्र की पुत्री पुष्पा का आकर्षण जब लोकगीत गानेवाले सूरज से हुआ तो पंडित जी ने पुत्री का विवाह अपने मित्र के लड़के जो पुजारी थे शीतल के साथ करवा दी।जो आर्थिक रूप से धनी था लेकिन पति के रूप में गरीब । दिन-भर मंदिर में और रात में खुर्राटे लेनेवाले शीतल के साथ पुष्पा मशीनी जीवन बिता रही थी। बड़ा बेटा इंजीनियरिग में प्रवेशा और छोटा बैंक की परीक्षा में सफल रहा। दोनों हॉस्टल चले गए। पति रूपी मशीन और उपेक्षा करनेवाले बच्चों के बीच फंसी पुष्पा के मन में बीच बीच में किशोरावस्था का प्रेमी सूरज की याद आती। पति की मृत्यु के बाद  अकेलेपन और वार्धक्य उन्हें बहुत सताए। घर की मरमत करके शिष्ट जीवन वहां बिताने की वह इच्छा करती थी किंतु उस घर को बेचने की इच्छा बच्चे भी। बच्चों के आग्रह पर वह पहले बड़े लड़के के पास बंबई आते है लेकिन सास का आना बहू को भाती नहीं। “ अपने घर में चैन से नहीं रहती। यहां आकर हमारे गृहस्थी में दखल देती है। ” बेटे के सामने बहू सास को मिठाइयां ओर पकवान खाने का आग्रह करती और बेटे के जाने पर बच्चों को लेकर बाहर जाते और रात को लौटते। नौकरों को भी छुट्टी देते इस पर पुष्पा को स्वयं भोजन बनाकर अकेले खानी पड़ती। यहां तक पोते भी उनके मन को चोट पहुंचाने लगे तो पुष्पा बैंगलोर छोटे बेटे के पास पहुंचती है। बेटे के काम पर जाने पर अकेलेपन उन्हें घेरते रहते है। वहां भी मन न लगने पर वह अपने मायके चली जाती है। वहां उनका मिलन पुराने प्रेमी सूरज से होता है। सूरज उन्हें कुछ सहायता देते है तो लोगों के बीच बदनामी फैलती है व बड़े लड़के उन्हें बुलाकर डांटते है। सूरज और रम्मो हमेशा  पुष्पा की सहायता के लिए है। वहां एक पुराना शिवलिंग पड़े मिलने पर सूरज वहां एक मंदिर बनवाते है और पुष्पा मंदिर की पूजारिन बनी । पुष्पा एक स्त्री होने तथा विधवा होने के नाते उनका पूजारिन बनना गांववालों से पचा नहीं गया। उनका पहले का जो प्रेम था सूरज से वह ही इस अवस्था आश्रय बनकर खड़ा है। वार्धक्य एवं अकेलेपन से गुजरती वृद्ध महिला के मानसिक तनाव और इस कारण से उस वृद्धा द्वारा होनेवाली क्रियाकलापों पर आधारित है यह कहानी।

कृष्णा अग्निहोत्री ने वृद्ध जीवन संबधी इन कहानियों के माध्यम से समकालीन समाज का एक सजीव झांकी पाठक के सामने प्रस्तुत की है। जिससे पाठकों को  वृद्ध लोगों के प्रति होनेवाले अयाचारों से अवगत कराते हुए उन वृद्धों का साथ देकर परिवार एवं समाज को आगे बढ़ाने  का संदेश कृष्णा जी इन कहानियों के द्वारा दी है।

संदर्भ ग्रंथ सूची

वृद्ध विमर्श, संजू , पृ . 1,2

अपना अपना अस्तित्व, कृष्णा अग्निहोत्री, पृ .17-26

 मैं जिंदा हूं, कृष्णा अग्निहोत्री, पृ      .27-34

तोर जवानी सलामत रहे, कृष्णा अग्निहोत्री, पृ .35-42

टीन के घेरे, कृष्णा अग्निहोत्री, पृ .92-97

प्रेमाश्रय , कृष्णा अग्रिहोत्री, पृ .71-78

 

सविता गोपीनाथन

शोधार्थी , हिंदी विभाग, सरकारी आर्ट्स एंड साइंस कॉलेज , कालीकट, केरल।