June 2, 2023

69. वृध्दावस्था विमर्श -डॉ. सुनीता राठौर

Page No.: 494-502 शोध – आलेख- वृध्दावस्था विमर्श डाॅ. सुनीता राठौर सहायक प्राध्यापक हिन्दी शासकीय एम.एम.आर. स्नातकोत्तर महाविद्यालय चाम्पा             वृध्द विमर्श का अर्थ है, वृध्दावस्था की परिस्थितियों, घटनाओं आदि का चिन्तन करना अर्थात् वृध्दावस्था की समस्याओं को समझकर उनके लिए उचित समाधान करना। आज के युग में वृध्द विमर्श अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि आज हम इतने व्यस्त हो गए है कि हमारे पास […]

May 31, 2023

91. समकालीन साहित्य में नारी-विमर्श -डॉ. हरमंदर सिंह

Page No.: 650-654 समकालीन साहित्य में नारी-विमर्श डॉ. हरमंदर सिंह प्राचार्य माता मोहन देवी बेदी कन्या महाविद्यालय अनुपगढ़, जि. श्री गंगानगर, राजस्थान   प्रस्तावना         सदियों से पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था ने नारी को सीमाओं के बंधन में बांध रखा है। नारी स्वतंत्र अस्तित्व की कामना करती रही किंतु उसे हमेशा सामाजिक मर्यादा तथा नैतिकता के मुद्दे से जोड़ दिया गया। परिणाम स्वरूप नारी पीढ़ियों से […]

May 30, 2023

90. मीडिया विमर्श के परिप्रेक्ष्य में सामाजिक -सांस्कृतिक बदलाव -लिबिल जैकब

Page No.: 644-649 मीडिया विमर्श के परिप्रेक्ष्य में सामाजिक -सांस्कृतिक बदलाव -लिबिल जैकब सारांश आज हम जी रहे हैं इक्कीसवीं सदी में। इस नए दौर में समूचे विश्व परिवर्तन के पथ पर है। परिवर्तन के इस प्रक्रिया में मीडिया महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। मीडिया,लोकतंत्र के अन्य तीन स्तंभों को अपने उत्तरदायित्व का बोध दिलाकर लोकतंत्र के […]

May 25, 2023

76. स्त्री विमर्श: कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्न – पूनम सिंह

स्त्री विमर्श: कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्न पूनम सिंह सारांश स्त्री मुक्ति से जुड़ी देह मुक्ति की धारणा ने आज भारतीय समाज में हलचल मचा रखी है। परिवार, विवाह, न्याय तथा धर्म जैसी संस्थाएँ पुरुष के निजी हितों की रक्षा करने के साथ ही स्त्री को हीन साबित करती आई हैं। पुरुष सत्ता द्वारा मातृत्व को स्त्री की दुर्बलता, योनि को कलंक एवं यौन उन्मुक्तता को अनैतिक […]

May 24, 2023

74. समकालीन कथा साहित्य में किन्नरों का उत्थान और पहचान एक संघर्ष – नीतू कुमारी

समकालीन कथा साहित्य में किन्नरों का उत्थान और पहचान एक संघर्ष नीतू कुमारी साहित्य आलोचना का एक सशक्त माध्यम है। इसलिए समय के साथ चलने वाले साहित्य अपने अतीत वर्तमान तथा भविष्य को रेखांकित करते हुए उनके खूबियों और खामियों को पाठक के समक्ष रखने वालों का मूल्यांकन करने में सक्षम होता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो समकालीन साहित्य का केंद्रीय प्रमुख मुद्दा […]

May 24, 2023

73. साहित्य और पर्यावरण का अंतरसंबंध – राधा देवी

साहित्य और पर्यावरण का अंतरसंबंध राधा देवी भूमिका भारतीय दर्शन एवं साहित्य प्रारम्भ से ही प्रकृति प्रधान एवं प्रकृति संरक्षणवादी रहा हैं। हमारे प्राचीन धर्म ग्रन्थों से लेकर लौकिक साहित्य तक ने जल, वायु, अग्नि, वृक्ष, जीव, भूमि की पूजा पर जोर दिया गया है। हिन्दी साहित्य में उल्लिखित प्रकृति, शब्द यह विचार सामने रखता है कि वह किसी में समाहित नहीं है। परिवार को […]

May 24, 2023

67. शैलेश मटियानी कृत नगरीय परिवेश की कहानियों में चित्रित नारी पात्रों का मनोवैज्ञानिक अध्ययन डॉ रंजीत कौर

Page No.: 480-486 शैलेश मटियानी कृत नगरीय परिवेश की कहानियों में चित्रित नारी पात्रों का मनोवैज्ञानिक अध्ययन डॉ रंजीत कौर भूमिकाः शैलेश मटियानी के साहित्य सृजन का प्रारंभिक काल मुंबई के महानगरीय परिवेश में बीता। जहां उन्हें मजदूरए श्रमिकए कुलीए उठाईगीरए उचक्कऐ और भिखारी समाज के बीच रहने का अवसर मिला। इस लिए उनके साहित्य में अनुभूतियों एवं संवेदनाओं के धरातल पर मानवता की सच्ची […]

May 24, 2023

60. समकालीन साहित्य में आर्थिक विमर्श –  डॉ0 जगदीश चन्द्र जोशी

Page No.: 430-437 समकालीन साहित्य में आर्थिक विमर्श –  डॉ0 जगदीश चन्द्र जोशी सारांश: समकालीन साहित्य में अभावों से जूझ रहे सर्वहारा वर्ग का कवियों ने सटीक चित्रण किया है। नागार्जुन, धूमिल, केदारनाथ सिंह, भवानी प्रसाद मिश्र, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन, रामशेर बहादुर सिंह, दुष्यन्त कुमार, मुक्तिबोध, कैलाश वाजपेई, उदय प्रकाश दिनकर आदि ने रोटी, कपड़ा और मकान से वंचित वर्ग को ही अपनी कविता का […]

May 24, 2023

59. जनसंचार के विभिन्न माध्यमों में हिन्दी – डॉ. श्याम लाल

Page No.: 418-419 जनसंचार के विभिन्न माध्यमों में हिन्दी डॉ. श्याम लाल हिन्दी भाषा की पृष्ठभूमि मानव जीवन में भाषा का एक विशेष महत्त्व है। यह समाज एवं संस्कृति की संवाहिका है। किसी भी देश का प्रतिबिम्ब उस देश की संस्कृति एवं भाषा में समाहित होता है तथा हिन्दी तो कालान्तर से ही साधु-सन्तों, महापुरुषों, फकीरों, वेद-ग्रन्थों, आध्यात्मिक विद्वानों, पर्यटकों, धार्मिक गुरुओं, साधकों और जनसामान्य […]

May 23, 2023

58. वर्तमान भारत में किन्नर समाज: किन्नर विमर्श के विशेष सन्दर्भ में – सत्य प्रकाश नाग

Page No.:410-417 वर्तमान भारत में किन्नर समाज: किन्नर विमर्श के विशेष सन्दर्भ में – सत्य प्रकाश नाग जनगणना 2011 के अनुसार भारत में किन्नरों की कुल आबादी 4.88 लाख रही। देश में किन्नरों की इतनी बड़ी आबादी होने के बाद भी ये समाज की मुख्य धारा से कटे रहे। इसका प्रमुख कारण भारतीय समाज का किन्नरों के प्रति धृणित दृष्टिकोण रहा है। किन्नरों को लगातार […]